थोड़ा सा वक़्त

A gentle reminder that every unfamiliar place was once new to everyone who now calls it home. Through simple verses, this poem celebrates patience, new beginnings, and the quiet magic of giving life a little time.

Mihir Kapse

थोड़ा सा वक़्त

नया-सा शहर,
नई-सी जगह,
नए-से लोग,
सब कुछ है नया-सा।
थोड़ा सा वक़्त देकर तो देखिए, जनाब।

मन है खोया सा,
चंचल होने में वक़्त नहीं।
ढूँढ़े कुछ अपना-अपना सा,
पर सब कुछ है नया-नया सा।
थोड़ा सा वक़्त देकर तो देखिए, जनाब।

घर से विदाई लिए आए हैं सब यहाँ,
थोड़े से खुशमिज़ाज, थोड़ी-सी दुःख की पुंजियाँ भी लिए।
सबने ठानी है करनी है नई शुरुआत, अंत का अता पता नहीं।
है सब कुछ नया-सा।
थोड़ा सा वक़्त देकर तो देखिए, जनाब।

समय का पहिया है गोल-सा,
सब कुछ है नया-सा—यही तो ध्यान की बात है।

नई शुरुआतों की यही तो ख़ास बात है।
थोड़ा सा वक़्त देकर तो देखिए, जनाब।
लोग अपने होने में देर कहाँ,
जगह अपनी बनने में देर कहाँ,
खुद को ढालने में देर कहाँ।
सिर्फ़ थोड़ा सा वक़्त देकर तो देखिए, जनाब।

Comments